झीरम नरसंहार पर एनआईए कोर्ट का फैसला आधा-अधूरा न्याय – कांग्रेस राजनीतिक साजिश का पर्दाफाश नहीं हुआ

अदालत का फैसला तथ्यों पर आधारित, पर एनआईए की जांच रही दिशाहीन; सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ न होने और चार्जशीट से बड़े नाम हटाने पर उठाए सवाल
जांजगीर-चांपा। 06 सितंबर 2026। 25 मई 2013 को हुए बहुचर्चित झीरम घाटी नरसंहार मामले में एनआईए कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को कांग्रेस ने ‘आधा-अधूरा न्याय’ बताया है। जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा सर्किट हाउस में आयोजित पत्रकार वार्ता में विधायक ब्यास कश्यप और जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने कहा कि वे अदालत के फैसले का पूरा सम्मान करते हैं। अदालत ने एनआईए द्वारा पेश किए गए तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है, लेकिन जांच एजेंसी की जांच शुरुआत से ही दिशाहीन रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि एनआईए ने घटना के पीछे मौजूद राजनीतिक षड्यंत्र के पहलू की जांच ही नहीं की। जिन 10 लोगों को सजा सुनाई गई है, वे केवल छोटे नक्सली कैडर हैं, जबकि इतनी बड़ी घटना बिना बड़े नक्सली नेताओं के संभव नहीं हो सकती।
सुरक्षा में चूक और रूट बदलने पर दागे सवाल
कांग्रेस नेताओं ने पत्रकार वार्ता में कई गंभीर सवाल खड़े किए:
- इस फैसले से घटना के असली साजिशकर्ताओं का पर्दाफाश नहीं हो सका है।
- कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ की सुरक्षा अचानक क्यों हटाई गई थी?
- यात्रा के तय मार्ग को किसने और किसके कहने पर बदलवाया था?
- एनआईए द्वारा नामजद किए गए 26 फरार आरोपियों में शामिल बसवराज, गणेश उइके, रूपेश उर्फ संजीव, सुरेन्द्र उर्फ रामचंद्र रेड्डी, जयदेव उर्फ बड्डा देव और सोनू उर्फ भूपति जैसे बड़े नामों में से जिन्होंने सरेंडर किया, उनसे एनआईए ने पूछताछ कब की? क्या उन्हें निर्दोष मान लिया गया है?
सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ क्यों नहीं हुई?
कांग्रेस ने सवाल उठाया कि झीरम हत्याकांड में शामिल और फरार घोषित कई प्रमुख नक्सलियों ने बाद में आत्मसमर्पण किया, लेकिन उनसे पूछताछ नहीं की गई:
- चैतू उर्फ श्याम दादा: दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) का वरिष्ठ सदस्य और 25 लाख का इनामी, जो हमले का मुख्य साजिशकर्ता माना जाता है। उसने अपने 9 कैडरों के साथ बस्तर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
- रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरेड्डी: माओवादी केंद्रीय समिति सदस्य, जिसने सरेंडर के बाद सार्वजनिक रूप से कहा था कि झीरम नरसंहार संगठन की एक बड़ी गलती थी।
- निर्मला उर्फ सुमित्रा: 20 लाख की इनामी महिला कैडर, जो हमले के दौरान अग्रिम मोर्चे और लॉजिस्टिक सपोर्ट में सक्रिय थी। नेताओं ने पूछा कि जब सरकार स्वयं दावा करती रही है कि ये बड़े नक्सली झीरम में शामिल थे, तो एनआईए ने इनसे पूछताछ क्यों नहीं की?
जांच प्रक्रिया पर खड़े किए गंभीर सवाल
नेताओं ने आरोप लगाया कि घटना के कई प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों से भी एनआईए ने पूछताछ नहीं की। जीवित बचे पीड़ितों के बयान नहीं लिए गए। घटना के कई हफ्तों बाद तक शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और जरूरी दस्तावेज घटनास्थल पर पड़े रहे, लेकिन किसी का मोबाइल तक जब्त नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त एनआईए ने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा गठित एसआईटी (SIT) को जांच करने से क्यों रोका और तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी व एडीजी (नक्सल) से पूछताछ क्यों नहीं की गई?
चार्जशीट से शीर्ष नक्सली नेताओं के नाम हटने पर आपत्ति
कांग्रेस ने बताया कि शुरुआती एफआईआर में दो प्रमुख नक्सली नेताओं मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति और रमन्ना का नाम दर्ज था। 21 मार्च 2014 को इनके खिलाफ वारंट भी जारी हुआ था, लेकिन सितंबर 2014 में पेश की गई चार्जशीट से अचानक इनके नाम हटा दिए गए। वहीं देवा उर्फ सुक्का से भी पूछताछ नहीं की गई। कांग्रेस ने मांग की है कि झीरम नरसंहार की राजनीतिक साजिश और सुरक्षा चूक की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, तभी शहीदों को सच्चा न्याय मिल सकेगा।
इस दौरान प्रदेश सह-प्रभारी विजय जांगिड़, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रमेश पैगवार, प्रदेश सचिव गिरधारी यादव, टिंकू मेमन, संदीप अग्रवाल, जिला सेवादल अध्यक्ष देवकुमार पाण्डेय, पिछड़ा प्रकोष्ठ अध्यक्ष भविष्य चंद्राकर, अजा प्रकोष्ठ अध्यक्ष महारथी बघेल, महिला कांग्रेस अध्यक्ष सीमा शर्मा, युंका जिलाध्यक्ष पंकज शुक्ला, जिला उपाध्यक्ष रफीक सिद्दीकी, संगठन महामंत्री शिशिर द्विवेदी, महामंत्री नागेन्द्र गुप्ता, पूर्व नपा अध्यक्ष भगवान दास गढ़ेवाल सहित अन्य कांग्रेसजन मौजूद थे।




