कल से शुरू हो रहा शक्ति का महापर्व: जानिए प्रतिपदा तिथि का समय, घटस्थापना का विधान और मां शैलपुत्री की संपूर्ण पूजा विधि

अश्विन शुक्ल प्रतिपदा पर 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ; प्रथम दिन पर्वतराज पुत्री मां शैलपुत्री की आराधना से शांत होगा चंद्र दोष
🔴 आज की बात News | धार्मिक डेस्क। आद्यशक्ति मां भगवती की उपासना का पावन पर्व शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से विधि-विधान के साथ शुरू होने जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधिवत पूजा-अर्चना की जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) के साथ प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से शैलपुत्री माता की उपासना करने से जीवन में सुख, शांति, स्थिरता और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
प्रतिपदा तिथि व घटस्थापना मुहूर्त
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार शारदीय नवरात्रि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होती है। वर्ष 2026 में प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 18 मिनट से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 9 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि की सर्वमान्य परंपरा के चलते शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 11 अक्टूबर को ही माना जाएगा और इसी दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना के साथ नौ दिवसीय शक्ति अनुष्ठान की विधिवत शुरुआत की जाएगी।
मां शैलपुत्री का स्वरूप और महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी सती ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया था, जिसके कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। माता शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित रहता है तथा उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। मां शैलपुत्री को शक्ति, दृढ़ता और प्रकृति का प्रतीक माना गया है। ज्योतिषीय दृष्टि से इनकी उपासना कुंडली के चंद्र दोष और चंद्रमा से जुड़े अशुभ प्रभावों को शांत करने में विशेष फलदायी मानी जाती है।
प्रिय भोग और पूजन की विधि
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मां शैलपुत्री को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पहले दिन की पूजा में माता को सफेद बर्फी, दूध से बनी मिठाइयां, रबड़ी, मावे के लड्डू या शुद्ध गाय के घी से तैयार हलवे का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर घटस्थापना की जाती है और इसके बाद मां शैलपुत्री का आह्वान कर श्वेत पुष्प, रोली, अक्षत, धूप व दीप से विधिवत पूजन संपन्न किया जाता है।
कल्याणकारी मंत्रों का जाप
पूजा-अर्चना के दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः”, “या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” तथा “वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्” मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करने से साधक को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।




