डोंगाकोहरौद के शिरीष पाठ मंदिर में सप्तमी और अष्टमी पर उमड़ी भारी भीड़: दूर-दराज से पहुंचे हजारों श्रद्धालु, हुई विशेष पूजा

269 तेल और 16 घृत ज्योति कलश हुए प्रज्वलित; समिति ने संभाली दर्शन व प्रसाद की कमान, कन्या पूजन के साथ संपन्न हुआ अनुष्ठान

🔴 आज की बात News | जांजगीर-चांपा। जिले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल ग्राम डोंगाकोहरौद स्थित शिरीष पाठ मंदिर में शारदीय नवरात्रि की सप्तमी और अष्टमी पर आस्था का अभूतपूर्व सैलाब देखने को मिला। खेतों के बीच स्थित इस सिद्ध पीठ में सुबह के ब्रह्म मुहूर्त से लेकर देर रात तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। कतारबद्ध होकर भक्तों ने माता रानी के दर्शन किए और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त किया।
दंतकथा पर आधारित सिद्ध पीठ में 285 ज्योति कलश प्रज्वलित
ग्राम डोंगाकोहरौद में जनश्रुति और दंतकथा पर आधारित यह प्राचीन मंदिर पूरे क्षेत्र में गहरी आस्था का केंद्र है। सामान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन क्वांर नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। इस वर्ष श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए 269 तेल ज्योति और 16 घृत (घी) ज्योति कलश प्रज्वलित कराए। इसके अलावा तीन दिवसीय और सात दिवसीय मनोकामना ज्योति भी भक्तों द्वारा जलवाए गए।
लोट मारते और घुटनों के बल पहुंचे श्रद्धालु, समिति ने संभाली व्यवस्था
माता के दरबार में भक्तों की गहरी श्रद्धा देखने को मिली। स्थानीय ग्रामीणों के साथ ही पामगढ़, धनगांव, मेंकरी, भीलौनी, केसला सहित दूर-दराज के गांवों से हजारों की तादाद में दर्शनार्थी पहुंचे। कई भक्त माता के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट करते हुए मंदिर परिसर तक लोट मारते और घुटनों के बल चलकर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने और सुगम दर्शन के लिए नवजागरण शिरीष कल्याण सेवा समिति द्वारा दर्शनार्थियों के लिए सुव्यवस्थित लाइन और प्रसाद वितरण के पुख्ता इंतजाम किए गए।

महाअष्टमी पर हवन, नव कन्या पूजन और अठवाही खेल की रही धूम
रविवार को महाअष्टमी के पावन पर्व पर मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधिवत हवन-पूजन संपन्न कराया गया। इसके उपरांत समिति की ओर से कन्या पूजन का आयोजन हुआ, जिसमें नौ कन्याओं को मां दुर्गा का साक्षात स्वरूप मानकर उनका चरण वंदन कर भोजन कराया गया और आशीर्वाद लिया गया। धार्मिक अनुष्ठान के बाद परंपरा के अनुसार अठवाही खेल का आयोजन हुआ, जिसमें सभी श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को हल्दी लगाकर पारंपरिक उल्लास और उत्साह के साथ पर्व मनाया।





