सोमनाथ अमृत महोत्सव: 1000 साल के संघर्ष और आस्था का प्रतीक सोमनाथ, आज ‘अमृत महोत्सव’ में शामिल होंगे प्रधानमंत्री मोदी

पुनर्निर्मित मंदिर के 75 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष आयोजन, महापूजा और ध्वजारोहण कार्यक्रम में शामिल होंगे प्रधानमंत्री; सोमनाथ से जुड़ा है मोदी का विशेष आध्यात्मिक संबंध
सोमनाथ। अरब सागर के तट पर स्थित भारत का प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमवार मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और सनातन आस्था का जीवंत प्रतीक माना जाता है। हजार वर्षों में कई विदेशी आक्रमणों और विध्वंस का सामना करने के बावजूद यह मंदिर हर बार पहले से अधिक भव्य स्वरूप में पुनः स्थापित हुआ। यही कारण है कि सोमनाथ मंदिर को भारत की अटूट आस्था और पुनर्जागरण की पहचान भी कहा जाता है।
आज 11 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ मंदिर पहुंचकर ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम में शामिल होंगे। यह आयोजन पुनर्निर्मित मंदिर के उद्घाटन और प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है।

75 वर्ष पूरे होने पर विशेष आयोजन
सोमनाथ अमृत महोत्सव के तहत मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी यहां विशेष महापूजा, कुंभाभिषेक और ध्वजारोहण कार्यक्रम में भाग लेंगे। यह अवसर ऐतिहासिक इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में भाग लिया था। अब उसी ऐतिहासिक क्षण के 75 वर्ष पूरे होने पर यह राष्ट्रीय स्तर का आयोजन किया जा रहा है।
1000 वर्ष पहले महमूद गजनवी ने किया था हमला
इतिहासकारों के अनुसार 6 जनवरी 1026 को महमूद गजनवी लगभग 30 हजार सैनिकों के साथ सोमनाथ पहुंचा था। तीन दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद उसकी सेना मंदिर परिसर में घुस गई। हमले के दौरान भारी लूटपाट की गई और मंदिर को क्षति पहुंचाई गई। कहा जाता है कि मंदिर की रक्षा में हजारों श्रद्धालुओं और रक्षकों ने अंतिम समय तक संघर्ष किया। हमले के बाद मंदिर से सोना, चांदी और बहुमूल्य रत्न लूटकर गजनी ले जाए गए। गजनवी के हमले के 1000 वर्ष पूर्ण होने पर जनवरी 2026 में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन भी किया गया था।
हर विध्वंस के बाद फिर खड़ा हुआ सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर को 11वीं से 18वीं शताब्दी के बीच कई बार विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा, लेकिन लोगों की आस्था कभी कमजोर नहीं हुई। हर बार मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया और यह फिर उसी गौरव के साथ खड़ा हुआ। गजनवी के हमले के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और परमार राजा भोज ने मंदिर के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में भी विभिन्न शासकों और भक्तों ने मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण में योगदान दिया।

सरदार पटेल ने लिया था पुनर्निर्माण का संकल्प
देश की आजादी के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल
ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। वर्ष 1947 में सोमनाथ यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिर को पुनः भव्य स्वरूप देने की घोषणा की थी। इसके बाद आधुनिक सोमनाथ मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हुआ और 11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
राम रथ यात्रा से भी जुड़ा है सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर भारतीय राजनीति और सांस्कृतिक आंदोलनों का भी प्रमुख केंद्र रहा है। वर्ष 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की चर्चित ‘राम रथ यात्रा’ की शुरुआत सोमनाथ से ही हुई थी।इसके बाद 31 अक्टूबर 2001 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी ने मंदिर पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ समारोह में भाग लिया था।

प्रधानमंत्री मोदी का सोमनाथ से विशेष जुड़ाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोमनाथ मंदिर से विशेष आध्यात्मिक और प्रशासनिक जुड़ाव रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक वे कई बार मंदिर पहुंच चुके हैं।
10-11 जनवरी 2026 को उन्होंने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व समारोह में भाग लिया था। इससे पहले 2 मार्च 2025 को उन्होंने मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना और रुद्राभिषेक किया था। 20 नवंबर 2022 को भी प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर में विशेष पूजा की थी।

20 अगस्त 2021 को प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सोमनाथ से जुड़े कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया था। वहीं 18 जनवरी 2021 को उन्हें Shree Somnath Trust का चेयरमैन नियुक्त किया गया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी पहली बार 8 मार्च 2017 को सोमनाथ मंदिर पहुंचे थे। जबकि 1 फरवरी 2014 को गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने मंदिर के पूर्ण हुए स्वर्ण शिखर का उद्घाटन किया था।
धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने इसी स्थान पर चंद्रदेव को श्राप से मुक्ति प्रदान की थी। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को ‘सोमनाथ’ कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंतिम लीला इसी क्षेत्र में पूर्ण की थी। सोमनाथ को शिव भक्तों के साथ-साथ वैष्णव परंपरा में भी विशेष महत्व प्राप्त है।

भव्य वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण
वर्तमान सोमनाथ मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में निर्मित है। मंदिर का मुख्य शिखर लगभग 155 फीट ऊंचा है, जबकि शीर्ष पर स्थापित कलश का वजन करीब 10 टन बताया जाता है। मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। समुद्र तट के किनारे स्थित यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला और आध्यात्मिक वैभव का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

स्वामी विवेकानंद भी हुए थे प्रभावित
वर्ष 1890 में स्वामी विवेकानंद ने सोमनाथ मंदिर का भ्रमण किया था। बाद में उन्होंने अपने भाषणों में कहा था कि सोमनाथ जैसे मंदिर भारत के संघर्ष, पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चेतना की जीवंत पहचान हैं।





