जाँजगीर -चाँपा

निलंबन के बाद भी कुर्सी पर काबिज? धुरकोट धान खरीदी केंद्र में किसका संरक्षण?


जांजगीर-चांपा। धान खरीदी में अनियमितताओं के आरोपों पर निलंबित किए गए धुरकोट धान खरीदी केंद्र के प्रभारी नागेंद्र प्रताप सिंह आखिर एक सप्ताह बाद भी कार्यभार क्यों नहीं सौंप रहे हैं? क्या प्रशासनिक आदेश उनके लिए बेमानी हो चुके हैं?
जब निलंबन स्पष्ट है, तो फिर कार्यवाही पंजी और महत्वपूर्ण दस्तावेज किसके संरक्षण में हैं? इन्हें सौंपने में जानबूझकर देरी क्यों की जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल—निलंबित अधिकारी पर कार्रवाई करने से सेवा सहकारी समिति के प्राधिकृत अधिकारी क्यों कतरा रहे हैं?
क्या धान खरीदी नीति की खुलेआम धज्जियां उड़ाने, अवैध खरीदी के प्रयास, परिजनों की नियमविरुद्ध नियुक्ति और किसानों के ऋण में गड़बड़ी जैसे गंभीर आरोप भी कार्रवाई के लिए काफी नहीं हैं? या फिर कहीं न कहीं कोई राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण काम कर रहा है?
यदि कार्यभार न सौंपने से धान की मात्रा में हेरफेर होती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? प्रशासन तब तक क्यों चुप है? क्या धान खरीदी केंद्र धुरकोट एक बड़े घोटाले की ओर बढ़ रहा है?
अब सवाल सिर्फ निलंबन का नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही का है। क्या जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करेंगे या यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

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