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गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर को विराजेंगे बप्पा; जानिए पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त और स्थापना की सही विधि

सुबह 11:20 से दोपहर 1:48 बजे तक रहेगा षोडशोपचार पूजन का समय; दिशा से लेकर भोग तक इन बातों का रखें ध्यान

🔴 धर्म डेस्क। विघ्नहर्ता, बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्रीगणेश का पावन जन्मोत्सव ‘गणेश चतुर्थी’ 14 सितंबर 2026 को पूरे देश में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इसी दिन से 10 दिवसीय गणेशोत्सव का महापर्व प्रारंभ होगा, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमा विसर्जन के साथ होगा। घर-घर और भव्य सार्वजनिक पंडालों में मंगलमूर्ति बप्पा के स्वागत एवं स्थापना की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

चतुर्थी तिथि और मध्याह्न पूजा का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर 2026 को प्रातः 7:06 बजे प्रारंभ होगी, जो 15 सितंबर 2026 को प्रातः 7:44 बजे तक रहेगी। उदयातिथि की शास्त्रीय मान्यता के आधार पर गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर को ही मनाया जाएगा।

  • मध्याह्न पूजा मुहूर्त: सुबह 11:20 बजे से दोपहर 1:48 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 28 मिनट) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीगणेश का प्राकट्य मध्याह्न काल (दोपहर के समय) में हुआ था। यही कारण है कि मध्याह्न काल में की जाने वाली षोडशोपचार पूजा को सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों है वर्जित?

गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को लेकर कड़े शास्त्रीय नियम हैं। पंचांग के अनुसार, 14 सितंबर को प्रातः 9:10 बजे से रात्रि 8:37 बजे तक चंद्र दर्शन पूरी तरह वर्जित रहेगा। पौराणिक मान्यता के अनुसार, चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से ‘मिथ्या कलंक दोष’ लगता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति पर समाज में बिना किसी अपराध या गलती के चोरी अथवा अन्य गलत कार्यों का झूठा आरोप लग सकता है। द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी इसी दिन चंद्र दर्शन के कारण ‘स्यमंतक मणि’ की चोरी का झूठा आरोप लगा था। इसलिए इस निर्धारित अवधि में चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए।

गणपति स्थापना के समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान

  • पवित्रता एवं दिशा: प्रतिमा स्थापना से पूर्व पूजा स्थल की गंगाजल छिड़क कर अच्छी तरह शुद्धि कर लें। चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर बप्पा को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) या पूर्व दिशा में स्थापित करें।
  • प्रिय वस्तुएं अर्पित करें: पूजन के दौरान भगवान गणेश को सिंदूर, 21 दूर्वा दल, लाल गुड़हल के फूल, शमी पत्र और मोदक या लड्डू का भोग अवश्य लगाएं। ध्यान रखें कि गणेश पूजन में तुलसी का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है।
  • नियम निष्ठा: एक बार प्रतिमा स्थापित करने के बाद संकल्प के अनुसार (डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन, 7 दिन या 10 दिन) दोनों समय सुबह-शाम आरती, मंत्र जाप और सात्विक भोग नियमित रूप से अर्पित करना चाहिए।

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