Chhattisgarh

सोशल मीडिया से टीवी डिबेट तक, क्यों गायब होती जा रही शालीनता?

राष्ट्रीय शालीनता दिवस पर डिजिटल दौर की बदलती भाषा और बढ़ती अभद्रता पर बड़ी बहस

नई दिल्ली। आज 14 मई को राष्ट्रीय शालीनता दिवस मनाया जा रहा है। तेजी से डिजिटल होती दुनिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच यह दिन पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक नजर आता है। इंटरनेट पर बढ़ती कटु भाषा, ट्रोल कल्चर, टीवी बहसों का शोर और सार्वजनिक संवाद में गिरती मर्यादा ने समाज को नई चिंता में डाल दिया है।

सोशल मीडिया ने बदल दी संवाद की संस्कृति

फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने लोगों को अपनी बात रखने की आजादी दी, लेकिन इसके साथ ही अभद्र भाषा और व्यक्तिगत हमलों का चलन भी तेजी से बढ़ा है। मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिपकर लोग ऐसी बातें लिख देते हैं, जिन्हें आमने-सामने कहने से अक्सर बचते हैं।

असहमति को तर्क और संवाद से रखने के बजाय अब गाली-गलौज, ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियां आम होती जा रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे समाज में स्वस्थ चर्चा और संवाद की संस्कृति कमजोर हुई है।

ओटीटी और डिजिटल कंटेंट का बढ़ता असर

वेब सीरीज, स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया कंटेंट में अपशब्दों के बढ़ते इस्तेमाल ने युवाओं की भाषा और व्यवहार पर भी असर डाला है। कई जगह अभद्र भाषा को “बोल्ड” और “कूल” दिखने का जरिया माना जाने लगा है।

विशेषज्ञों के अनुसार जब लोकप्रिय चेहरे और डिजिटल कंटेंट में लगातार आक्रामक भाषा दिखाई जाती है, तो उसका प्रभाव सीधे युवा पीढ़ी पर पड़ता है। धीरे-धीरे तर्क की जगह तीखी और अपमानजनक भाषा को प्रभावशाली मान लिया जाता है।

टीवी बहसों में बढ़ता शोर और घटती संवाद संस्कृति

आज टीवी चैनलों पर होने वाली राजनीतिक बहसें सूचना और विचार-विमर्श का मंच कम, शोर-शराबे का अखाड़ा ज्यादा नजर आने लगी हैं। बहसों में अक्सर मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, ऊंची आवाज में बोलने और सामने वाले को रोकने की होड़ दिखाई देती है।

कई कार्यक्रमों में एंकर और प्रवक्ता अपनी बात को तथ्यों और तर्कों से मजबूत करने के बजाय आक्रामक अंदाज और तीखी भाषा का सहारा लेते नजर आते हैं। इसका असर समाज पर भी पड़ रहा है। लोग यह मानने लगे हैं कि जो सबसे ज्यादा तेज बोलता है या दूसरों को दबा देता है, वही प्रभावशाली है।

सोशल मीडिया पर भी टीवी बहसों की यही शैली तेजी से दिखाई देने लगी है, जहां असहमति का जवाब संवाद से नहीं बल्कि कटाक्ष और अपमानजनक टिप्पणियों से दिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र की असली ताकत स्वस्थ बहस और विचारों के आदान-प्रदान में होती है, न कि शोर और कटुता में।

महापुरुषों की भाषा में था संयम और गरिमा

भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जहां नेताओं ने गंभीर मतभेदों के बावजूद अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखी। महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ बड़े आंदोलन चलाए, लेकिन उनके शब्दों में कभी कटुता नहीं दिखी।

जवाहरलाल नेहरू की भाषा में तर्क और गंभीरता दिखाई देती थी, जबकि लाल बहादुर शास्त्री अपनी सादगी और संतुलित संवाद के लिए पहचाने जाते थे। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने हमेशा युवाओं को सकारात्मक सोच और विनम्र व्यवहार का संदेश दिया।

वहीं अटल बिहारी वाजपेयी अपनी प्रभावशाली लेकिन मर्यादित वक्तृत्व शैली के लिए जाने जाते थे। संसद में तीखी बहसों के दौरान भी उनकी भाषा में गरिमा बनी रहती थी। सुषमा स्वराज भी अपनी स्पष्ट लेकिन संयमित भाषा के कारण सभी दलों में सम्मानित थीं।

इन नेताओं ने यह साबित किया कि अपनी बात मजबूती से रखने के लिए अभद्रता जरूरी नहीं होती। संवाद की असली ताकत शब्दों की मर्यादा और व्यवहार की शालीनता में होती है।

शालीनता सिर्फ शब्द नहीं, संस्कार है

विशेषज्ञों का मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। इंटरनेट पर लिखे गए शब्द किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में भाषा की मर्यादा बनाए रखना समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए जरूरी है।

राष्ट्रीय शालीनता दिवस लोगों को यह याद दिलाता है कि आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में भी संवाद में सम्मान, संयम और इंसानियत की जगह बनी रहनी चाहिए।

Related Articles

Back to top button