हरदी महामाया मंदिर की ख्याति सात समंदर पार: स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया से जले ज्योत; आज महासप्तमी की रात होगा अलौकिक चमत्कार

1724 मनोकामना दीपों से जगमगाया पावन धाम, आधी रात को फर्श पर उभरेंगे शेर के पदचिन्ह
🔴 आज की बात News | जांजगीर-चांपा। शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी पर धर्मनगरी जांजगीर-चांपा के शक्तिपीठों में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। जिला मुख्यालय स्थित कुलदेवी मां देवी दाई मंदिर और ग्राम खोखरा के मां मनका दाई मंदिर सहित सभी देवालयों में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ पहुंच रही है। वहीं, ग्राम हरदी स्थित सुप्रसिद्ध मां महामाया मंदिर में इस बार आस्था का अनूठा और वैश्विक स्वरूप देखने को मिल रहा है, जहां देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालुओं ने मनोकामना दीप प्रज्ज्वलित कराए हैं।

सात समंदर पार तक पहुंची मां की महिमा
मां महामाया के इस पावन दरबार के प्रति अटूट आस्था का आलम यह है कि मंदिर परिसर में कुल 371 जवा कलश और 1724 अखंड मनोकामना ज्योति कलश जगमगा रहे हैं। मंदिर समिति के अनुसार, इस वर्ष विदेश में रहने वाले भक्तों ने भी माता के दरबार में आस्था के दीप जलवाए हैं। इनमें स्वीडन से 3, ऑस्ट्रेलिया से 1 और मॉरीशस से 1 ज्योति कलश शामिल हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ से बाहर देश के अन्य राज्यों से भी 16 श्रद्धालुओं ने मनोकामना कलश स्थापित कराए हैं। दीपों की इस अविरल ज्योति से पूरा मंदिर प्रांगण भक्तिमय आभा से आलोकित है।
सप्तमी की मध्यरात्रि दिखेगा अलौकिक चमत्कार
महामाया मंदिर हरदी में महासप्तमी की रात घटने वाली चमत्कारी परंपरा को देखने के लिए हर वर्ष की भांति आज शनिवार, 17 अक्टूबर की मध्यरात्रि भारी संख्या में श्रद्धालु जुटेंगे। मान्यता है कि सप्तमी की आधी रात को मां जगदंबा स्वयं शेर पर सवार होकर भोग व प्रसाद ग्रहण करने गर्भगृह में पधारती हैं।

फर्श पर उभरते हैं शेर के पंजों के निशान
परंपरा के अनुसार, रात्रि 11 बजे विधिवत पूजा-अर्चना और माता को भोग लगाने के बाद गर्भगृह के फर्श पर सूखा आटा फैला दिया जाता है। इसके बाद गर्भगृह के मुख्य कपाट बंद कर दिए जाते हैं। गर्भगृह में प्रवेश का कोई अन्य मार्ग नहीं है। ठीक रात 12 बजे के बाद जब पुजारी कपाट खोलते हैं, तो आटे पर शेर के पंजों के स्पष्ट निशान दिखाई पड़ते हैं। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन मात्र के लिए दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।
दशकों से जारी है आस्था का सिलसिला
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, आटे पर शेर के पदचिन्ह बनने की यह रहस्यमयी परंपरा पिछले कई दशकों से अनवरत चली आ रही है। माता के इस साक्षात चमत्कार और भक्तों की हर मुराद पूरी होने के विश्वास के चलते ही हर साल यहां भारत सहित विदेशों से भी ज्योति कलश प्रज्ज्वलित कराने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।





