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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग, 73 विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में पेश किया नया प्रस्ताव

नई दिल्ली । देश में चुनावी सरगर्मियों के बीच विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को राज्यसभा के करीब 73 सांसदों ने उनके खिलाफ ‘सिद्ध दुराचार’ (Proven Misconduct) का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने का नया प्रस्ताव उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को सौंपा है।

क्यों उठा यह कदम?
विपक्षी सांसदों का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने आचार संहिता (MCC) लागू करने में ‘पक्षपातपूर्ण’ रवैया अपनाया है। प्रस्ताव में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को उठाया गया है:
दोहरे मापदंड: सांसदों का कहना है कि चुनाव आयोग भाजपा की शिकायतों पर विपक्षी नेताओं (खासकर कांग्रेस) के खिलाफ तो तुरंत एक्शन लेता है, लेकिन विपक्ष की शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
प्रधानमंत्री के भाषण का हवाला: पत्र में 18 मार्च को पीएम मोदी के एक भाषण का जिक्र किया गया है, जिसे दूरदर्शन और आकाशवाणी पर लाइव दिखाया गया। विपक्ष का आरोप है कि इस भाषण में विपक्षी दलों पर गंभीर आरोप लगाए गए और मतदाताओं से उनके खिलाफ वोट करने की अपील की गई, जो नियमों का उल्लंघन है।
कार्रवाई में देरी: सांसदों का दावा है कि 19 और 20 अप्रैल को दी गई शिकायतों पर आयोग ने अब तक कोई ‘कारण बताओ नोटिस’ या प्रतिक्रिया जारी नहीं की है।

जांच के लिए बने तीन सदस्यीय कमेटी
विपक्षी दलों ने मांग की है कि इन आरोपों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाए। इस कमेटी में:
सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज।
किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश।
एक अन्य न्यायिक सदस्य शामिल हों।
सांसदों ने यह भी मांग की है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक ज्ञानेश कुमार को चुनाव से जुड़े सभी कार्यों से दूर रखा जाए।

दूसरी बार लाया गया प्रस्ताव
गौरतलब है कि इससे पहले 12 मार्च को भी 193 सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर) ने उन्हें हटाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे 6 अप्रैल को सबूतों की कमी बताकर खारिज कर दिया गया था। हालांकि, विपक्ष का कहना है कि यह नया नोटिस 15 मार्च 2026 के बाद हुई ‘चूक और गलतियों’ के नए आधार पर दिया गया है।

सियासी माहौल गरमाया
तमिलनाडु चुनाव और पश्चिम बंगाल के पहले चरण के मतदान के ठीक बाद उठाए गए इस कदम ने देश का सियासी पारा बढ़ा दिया है। जहाँ विपक्ष इसे ‘लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई’ बता रहा है, वहीं सरकार और सत्ता पक्ष इसे चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश करार दे सकते हैं।

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