जांजगीर-चांपा: सरकारी संसाधनों पर “चार्जिंग हब” का खेल? डीपीओ पर गंभीर आरोप

सरकारी बिजली से निजी वाहन चार्जिंग, सरकारी गाड़ी के निजी उपयोग और पत्रकारों को धमकाने के आरोपों से महिला एवं बाल विकास विभाग में मचा हड़कंप।
जांजगीर-चांपा। जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग में पदस्थ विभाग प्रमुख अनीता अग्रवाल एक के बाद एक गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में हैं। सरकारी कार्यालय की बिजली से निजी वाहन चार्ज करने, सरकारी वाहन और ईंधन के निजी उपयोग तथा पत्रकारों से कथित दुर्व्यवहार के आरोपों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
मामला तब और गरमा गया जब मीडिया के पास ऐसे कथित वीडियो सामने आने की चर्चा हुई, जिनमें कार्यालय परिसर में निजी वाहन चार्ज होते और बिलासपुर स्थित निजी आवास पर सरकारी वाहन खड़ा दिखाई देने का दावा किया जा रहा है।
सरकारी वाहन के निजी उपयोग के आरोप
सूत्रों के अनुसार डीपीओ अनीता अग्रवाल लंबे समय से बिलासपुर से जांजगीर-चांपा तक रोजाना अप-डाउन कर रही थीं। आरोप है कि इस दौरान सरकारी वाहन और सरकारी ईंधन का उपयोग किया जा रहा था। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि जब अधिकारी मुख्यालय में निवास नहीं कर रही थीं, तो सरकारी वाहन को निजी आवास में रखने की अनुमति किस आधार पर दी गई।
सरकारी बिजली से निजी वाहन चार्जिंग पर सवाल
विभागीय कार्यालय परिसर में निजी इलेक्ट्रिक वाहन चार्ज किए जाने के आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। सूत्रों का दावा है कि मीडिया कर्मियों ने कार्यालय परिसर में वाहन चार्जिंग का वीडियो रिकॉर्ड किया था। आरोप है कि इसके बाद डीपीओ ने पत्रकारों को अपने चेंबर में बुलाकर उनके नाम और मोबाइल नंबर नोट किए तथा नाराजगी जाहिर की। बातचीत के दौरान कथित तौर पर “देख लूंगी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किए जाने की भी चर्चा है।
“कलेक्टर की मौखिक अनुमति” का दावा
मीडिया के सवालों पर डीपीओ द्वारा कथित रूप से यह कहा गया कि कार्यालय परिसर में वाहन चार्जिंग “कलेक्टर की मौखिक अनुमति” से की जा रही थी। हालांकि अब तक इस संबंध में कोई लिखित आदेश सार्वजनिक नहीं हुआ है। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या सरकारी कार्यालय और बिजली का उपयोग निजी सुविधा केंद्र की तरह किया जा सकता है।
बिजली बिल बकाया होने की भी चर्चा
सूत्रों के मुताबिक विभाग का बिजली बिल भी बकाया बताया जा रहा है। इसके बावजूद सरकारी बिजली से निजी वाहन चार्ज किए जाने के आरोपों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकारी संसाधनों के निजी उपयोग के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह वित्तीय अनियमितता और सेवा नियमों के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है।
जांच और कार्रवाई पर टिकी नजरें
मामले को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि यदि विभाग प्रमुख ही सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर सवालों में हैं, तो अधीनस्थ कर्मचारियों में अनुशासन कैसे कायम रहेगा।
पूरे घटनाक्रम के बाद अब जिला प्रशासन की भूमिका पर निगाहें टिकी हैं कि मामले में जांच होती है या नहीं और यदि होती है तो क्या कार्रवाई सामने आती है।




