भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार: जब असुरों को छला और देवताओं को पिलाया अमृत, जानें इस रहस्यमयी स्वरूप की कथा

धर्म डेस्क। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भी धरती पर अधर्म का प्रभाव बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब-तब श्रीहरि विभिन्न अवतार लेकर संतुलन स्थापित करते हैं। इन्हीं अवतारों में से एक है मोहिनी अवतार। यह अवतार सौंदर्य, चातुर्य, मोह और नीति का एक अद्भुत संगम है।
क्यों लिया भगवान ने स्त्री रूप?
श्रीमद्भागवत महापुराण के 8वें स्कंध के अनुसार, महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब स्वर्ग ‘श्रीहीन’ (शक्ति और वैभव विहीन) हो गया, तब धन-संपदा की पुनः प्राप्ति के लिए देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। मंथन के दौरान जब भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो असुरों ने बलपूर्वक उसे छीन लिया। असुरों का उद्देश्य अमृत पीकर अमर होना और तीनों लोकों पर अधर्म का राज स्थापित करना था। सृष्टि को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने विश्व की सबसे सुंदर और मायावी स्त्री ‘मोहिनी’ का रूप धारण किया।

मोहिनी की माया और असुरों का सम्मोहन
मोहिनी का रूप इतना मनमोहक था कि जो भी उन्हें देखता, अपनी सुध-बुध खो बैठता था। जब मोहिनी असुरों के बीच पहुँचीं, तो उनके अद्भुत सौंदर्य और मीठी बातों में आकर असुर पूरी तरह सम्मोहित हो गए। उन्होंने स्वयं ही अमृत का कलश मोहिनी को सौंप दिया और उन्हें अमृत वितरण का अधिकार दे दिया। मोहिनी ने चतुराई से देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया। उन्होंने अपने रूप के जाल में असुरों को उलझाए रखा और सारा अमृत देवताओं को पिलाना शुरू कर दिया।

राहु-केतु के जन्म की कहानी
अमृत वितरण के दौरान ‘स्वर्भानु’ नामक एक असुर भगवान की इस माया को समझ गया। वह रूप बदलकर देवताओं की पंक्ति में जा बैठा और छल से अमृत का पान कर लिया। सूर्यदेव और चंद्रदेव ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को संकेत दिया। तत्काल भगवान ने अपने वास्तविक स्वरूप में आकर सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चूँकि उसने अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं, इसलिए वह मरा नहीं। उसका कटा हुआ सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ के नाम से अमर हो गया।
मोहिनी अवतार का संदेश
भगवान विष्णु का यह अवतार हमें सिखाता है कि कई बार बड़ी बुराई को समाप्त करने के लिए नीति और चातुर्य का सहारा लेना आवश्यक होता है। यह अवतार केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए की गई एक महान कूटनीति का उदाहरण है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रसंगों पर आधारित है।




