सुप्रीम कोर्ट में भड़के जज: कपिल सिब्बल को दी सख्त चेतावनी— ‘ED, ED की रट न लगाएं, सीधे मुद्दे पर आएं वरना मुश्किल में पड़ जाएंगे’

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच चल रही कानूनी जंग ने आज उस वक्त नाटकीय मोड़ ले लिया, जब कोर्ट ने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को कड़े लहजे में फटकार लगाई। जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने दो टूक कहा कि सिर्फ ‘ED’ का नाम जपते रहने से काम नहीं चलेगा, मामले के मूल मुद्दे पर बात करें।
क्या है पूरा विवाद?
ED ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि कोलकाता स्थित I-PAC दफ्तर में छापेमारी के दौरान खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य सरकार ने जांच में सीधा दखल दिया। पिछली सुनवाई में भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि किसी जांच एजेंसी के काम में इस तरह का हस्तक्षेप ‘अच्छी स्थिति’ नहीं है।
सिब्बल की दलील: “याचिका ही गलत है”
कपिल सिब्बल ने ED की याचिका की वैधता पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने तर्क दिया: यह याचिका एक डिप्टी डायरेक्टर ने दायर की है, जो घटना के वक्त मौके पर मौजूद ही नहीं थे। जो व्यक्ति पीड़ित नहीं है, वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा कैसे उठा सकता है? सिब्बल ने कहा कि अगर विवाद है, तो केंद्र सरकार को अनुच्छेद 131 के तहत आना चाहिए, न कि सीधे अनुच्छेद 32 के तहत।
कोर्ट का तीखा पलटवार: “हमें उपदेश न दें”
सिब्बल की दलीलों पर बेंच ने सख्त रुख अपनाया और कई गंभीर सवाल दागे: कोर्ट ने पूछा, “क्या कानून का शासन (Rule of Law) अपने आप में एक मौलिक अधिकार नहीं है?” जस्टिस ने सिब्बल से पूछा, “अगर खुद मुख्यमंत्री जांच में दखल दें, तो ED शिकायत किससे करेगी? उसी राज्य सरकार से जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री कर रहे हैं?” जब सिब्बल ने कुछ टिप्पणी की, तो कोर्ट ने तल्ख अंदाज में कहा, “हमें उपदेश न दें कि हमें क्या करना है। हमें यह मत बताइए कि हम उत्तेजित हो रहे हैं, हम सिर्फ सवाल पूछ रहे हैं।”
‘ED-ED की रट न लगाएं’
बहस के दौरान जब सिब्बल बार-बार ED की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे थे, तब कोर्ट ने उन्हें अंतिम चेतावनी देते हुए कहा “ईडी, ईडी, ईडी की रट मत लगाइए। मुद्दे पर आइए… अन्यथा आप मुश्किल में पड़ जाएंगे।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिब्बल को उन अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर भी ध्यान देना चाहिए जिन्होंने अलग से याचिका दायर की है।
“कानून में उपाय मौजूद हैं”
सिब्बल ने बचाव करते हुए कहा कि लोक सेवक के काम में बाधा डालना अपराध है और इसके लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई हो सकती है, लेकिन हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट लाना सही नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने साफ कर दिया कि PMLA जांच और जांच में ‘हस्तक्षेप’ दो अलग पहलू हैं और हस्तक्षेप के आरोप को एक स्वतंत्र मामले की तरह देखा जाएगा।




