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700 साल पुराना पिलुआ हनुमान मंदिर: जहां आस्था, इतिहास और चमत्कारों की कहानियां आज भी जीवित हैं

इटावा के यमुना तट पर स्थित सिद्धपीठ में लेटी हुई बाल हनुमान प्रतिमा के दर्शन के लिए देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु

🔴 Aaj Ki Baat News । धर्म डेस्क

भगवान हनुमान के मंदिर देशभर में मौजूद हैं, लेकिन कुछ मंदिर अपनी विशेष मान्यताओं, इतिहास और आस्था के कारण अलग पहचान रखते हैं। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में स्थित पिलुआ हनुमान मंदिर भी ऐसा ही एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

इटावा मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर प्रतापनगर रुरा गांव में यमुना नदी के किनारे स्थित यह मंदिर क्षेत्र की प्रमुख सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। मंदिर में स्थापित बाल रूप हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, जो श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र बनी हुई है।

700 वर्ष पुराना बताया जाता है मंदिर

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पिलुआ हनुमान मंदिर का इतिहास लगभग 700 वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि प्रारंभिक समय में यहां पिलुआ वृक्ष के नीचे हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित थी। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और मंदिर का विस्तार कर इसे भव्य स्वरूप दिया गया।

क्षेत्र में पिलुआ वृक्षों की अधिकता के कारण ही इस मंदिर को “पिलुआ हनुमान मंदिर” के नाम से पहचान मिली। वर्तमान में यह मंदिर उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

लेटी हुई बाल हनुमान प्रतिमा है विशेष आकर्षण

मंदिर में स्थापित बाल रूप हनुमान जी की प्रतिमा स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से बेहद अनूठी मानी जाती है। प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में है और उसका मुख खुला हुआ है, जिसे लेकर विभिन्न धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होती हैं और बजरंगबली अपने भक्तों की हर प्रार्थना सुनते हैं।

प्रसाद और दूध ग्रहण करने की प्रचलित मान्यता

मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में यह भी शामिल है कि हनुमान जी की प्रतिमा भक्तों द्वारा अर्पित लड्डू और दूध को स्वीकार करती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस विश्वास के साथ यहां प्रसाद चढ़ाने पहुंचते हैं। हालांकि इन मान्यताओं के संबंध में कोई आधिकारिक वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्षों से यह आस्था श्रद्धालुओं के बीच बनी हुई है और मंदिर की विशेष पहचान का हिस्सा मानी जाती है।

महाभारत काल से जुड़ी हैं लोकमान्यताएं

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार मंदिर का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इस संबंध में कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय परंपराओं और लोककथाओं में इसका उल्लेख मिलता है। इसी कारण यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

मंगलवार और शनिवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

मंगलवार और शनिवार को मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसके चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वहीं बुढ़वा मंगल सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात कही जाती है। भक्तों का मानना है कि इस सिद्धपीठ में सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

आस्था का प्रमुख केंद्र बना पिलुआ हनुमान मंदिर

यमुना तट पर स्थित यह प्राचीन मंदिर आज आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का अनूठा संगम बन चुका है। इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास ने पिलुआ हनुमान मंदिर को उत्तर भारत के प्रमुख हनुमान मंदिरों में विशेष स्थान दिलाया है।

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