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पति की दीर्घायु और अखंड सुहाग का पावन पर्व करवा चौथ 29 अक्टूबर को, बन रहा विशेष योग; जानें व्रत कथा और महत्व

सती करवा के तपोबल की अमर गाथा से जुड़ी परंपरा, रात 8:17 बजे चंद्र दर्शन के बाद खुलेगा निर्जला व्रत

🔴 धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य, समर्पण और अटूट प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन पर महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के साथ सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। शाम के समय संपूर्ण विधि-विधान से करवा माता की पूजा-अर्चना की जाती है, व्रत की कथा सुनी जाती है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर छलनी से पति का दीदार करने के बाद ही व्रत पूर्ण होता है।

29 अक्टूबर को रखा जाएगा व्रत, नोट करें शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार इस वर्ष करवा चौथ का पावन पर्व 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। इस दिन पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 5:38 बजे से लेकर 6:56 बजे तक रहेगा। वहीं व्रत का कुल समय सुबह 6:31 बजे से प्रारंभ होकर रात 8:17 बजे तक रहेगा। इस दौरान सुहागिनें अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर ईश्वर की आराधना में लीन रहेंगी।

रात 8:17 बजे होगा चंद्रोदय

व्रत का समापन रात्रि में चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के साथ होता है। इस वर्ष चंद्रोदय का समय रात 8:17 बजे निर्धारित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न शहरों और भौगोलिक क्षेत्रों में चंद्र दर्शन के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है, इसलिए व्रती महिलाएं अपने स्थानीय पंचांग अथवा समयानुसार चंद्र दर्शन कर पूजा संपन्न करें। चंद्रमा को कच्चे दूध और जल का अर्घ्य देने के उपरांत पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।

सती करवा और यमराज से जुड़ी पौराणिक कथा का महत्व

करवा चौथ के पीछे पतिव्रता सती करवा के त्याग और साहस की अमर गाथा जुड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार नदी में स्नान के दौरान जब एक मगरमच्छ ने करवा के पति का पैर पकड़ लिया, तब करवा ने अपने सतीत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उस विशाल मगरमच्छ को कच्चे सूत के धागे से बांध दिया था। इसके पश्चात वे सीधे यमराज के समक्ष उपस्थित हुईं और अपने पति के जीवनदान की मांग करते हुए मगरमच्छ को दंड देने का आग्रह किया। करवा की इस अगाध निष्ठा और पति-भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उनके पति को दीर्घायु का वरदान प्रदान किया। तभी से सुहागिनों द्वारा अखंड सौभाग्य के लिए इस व्रत को करने की परंपरा अनवरत चली आ रही है।

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