हिमाचल: सिरमौर में ‘बहुपति प्रथा’ के तहत विवाहित महिला की प्रेग्नेंसी चर्चा में, कानूनी पहचान पर उठे सवाल
डिजिटल डेस्क। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में ‘बहुपति प्रथा’ (Polyandry) के तहत दो सगे भाइयों से विवाह करने वाली महिला की गर्भावस्था की खबर ने एक बार फिर पुरानी जनजातीय परंपराओं और आधुनिक वैधानिक ढांचे के बीच के अंतर्विरोध को चर्चा में ला दिया है। हट्टी जनजाति में प्रचलित रही इस ऐतिहासिक प्रथा के तहत हुआ यह विवाह अब कानूनी और सामाजिक पहचान के नए सवालों से घिर गया है।
क्या है पूरा मामला?
प्रदीप और कपिल नेगी नामक दो भाइयों की पत्नी के गर्भवती होने के बाद सबसे बड़ा सवाल ‘पितृत्व’ (Paternity) की कानूनी पहचान को लेकर उठ रहा है। हालांकि, हट्टी जनजाति की पारंपरिक व्यवस्था में परिवार के सभी भाइयों को समान दर्जा प्राप्त है, लेकिन आधिकारिक दस्तावेजों में इस स्थिति को दर्ज करना एक बड़ी चुनौती है।
कानूनी पेच: परंपरा बनाम संविधान
भारतीय कानून के तहत इस तरह के विवाहों की स्थिति जटिल है: Hindu Marriage Act और Special Marriage Act के अंतर्गत भारत में ‘बहुपति’ या ‘बहुपत्नी’ विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है।
दस्तावेजीकरण: आधिकारिक रिकॉर्ड जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड या स्कूल दाखिले में आमतौर पर बड़े भाई का नाम ही पति और बच्चे के पिता के रूप में दर्ज किया जाता है, भले ही जैविक पिता (Biological Father) कोई भी हो।
ऐतिहासिक संदर्भ और ‘यशवंत सिंह परमार’ का शोध
हिमाचल प्रदेश के निर्माता और प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार ने इस प्रथा के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर गहरा शोध किया है। डॉ. परमार के अनुसार, यह परंपरा मुख्य रूप से संपत्ति के बंटवारे को रोकने और सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी क्षेत्रों में परिवार को एकजुट रखने के उद्देश्य से विकसित हुई थी। इसमें पैतृक भूमि का टुकड़ों में बंटना रुक जाता है।
बदलते सामाजिक परिवेश में चुनौती
पारंपरिक नियमों के अनुसार, पत्नी को यह तय करने का अधिकार होता है कि वह किस समय किस पति के साथ रहेगी। इस मामले में, विवाह के कुछ समय बाद छोटा भाई कपिल विदेश चला गया, जबकि बड़ा भाई प्रदीप भारत में ही कार्यरत है। हाल ही में दंपति द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के बाद यह मामला पुनः सुर्खियों में है।
यह घटना न केवल एक दुर्लभ जनजातीय परंपरा की झलक दिखाती है, बल्कि यह भी उजागर करती है कि कैसे आधुनिक कानून और सदियों पुरानी प्रथाएं आज भी एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं।




