बिना ऑपरेशन ठीक हुआ दुर्लभ पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम, जटिल एंडोस्कोपिक प्रक्रिया से बची 30 वर्षीय युवक की जान

जबलपुर में सफल उपचार, जांजगीर के वरिष्ठ पत्रकार टी.सी. अग्रवाल के पुत्र डॉ. आलोक बंसल ने किया दुर्लभ चिकित्सकीय कारनामा
🔴 Aaj Ki Baat News | जांजगीर-चांपा
जबलपुर में एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी से पीड़ित 30 वर्षीय युवक का सफल उपचार बिना बड़ी सर्जरी के एंडोस्कोपिक तकनीक के माध्यम से किया गया। इस जटिल चिकित्सा प्रक्रिया को अंजाम देकर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. आलोक बंसल और उनकी टीम ने मरीज की जान बचाने में सफलता हासिल की। डॉ. आलोक बंसल जांजगीर-चांपा के वरिष्ठ पत्रकार टी.सी. अग्रवाल के सुपुत्र हैं।
पैंक्रियाटाइटिस के बाद हुई गंभीर जटिलता
जानकारी के अनुसार युवक रोशन जॉर्ज एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस (अग्न्याशय में तीव्र सूजन) से पीड़ित था। बीमारी के दौरान उसे डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम (DPDS) नामक दुर्लभ और जानलेवा जटिलता हो गई। डॉ. आलोक बंसल ने बताया कि पैंक्रियाटाइटिस के दौरान कई बार पैंक्रियास के आसपास नेक्रोटिक कलेक्शन बन जाता है, जिससे पैंक्रियाटिक डक्ट बीच से क्षतिग्रस्त होकर अलग हो जाती है। ऐसी स्थिति में पैंक्रियाटिक जूस छोटी आंत में पहुंचने के बजाय पेट या फेफड़ों में रिसने लगता है, जिससे संक्रमण, सांस लेने में परेशानी, लगातार बुखार, वजन घटना और अन्य गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

जांच में सामने आई दुर्लभ बीमारी
मरीज का प्रारंभिक उपचार अन्य अस्पताल में चल रहा था, लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं होने पर उसे गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक, जबलपुर लाया गया। जांच के दौरान मरीज की ऑक्सीजन कम होने लगी। छाती के एक्स-रे में दाएं फेफड़े में 25 प्रतिशत से अधिक द्रव जमा पाया गया, जो इस बीमारी में बेहद असामान्य स्थिति मानी जाती है। इसके अलावा पैंक्रियास के हेड भाग में नेक्रोटिक कलेक्शन भी मिला। इन संकेतों के आधार पर चिकित्सकों ने डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम की आशंका जताई, जिसकी पुष्टि आगे की जांच में हुई।
ERCP तकनीक से बिना सर्जरी किया उपचार
मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए पहले फेफड़ों में जमा द्रव निकाला गया। इसके बाद ईआरसीपी (ERCP) प्रक्रिया के जरिए उपचार शुरू किया गया। डॉ. बंसल ने बताया कि इस प्रक्रिया में एंडोस्कोपी की सहायता से पैंक्रियाटिक डक्ट के टूटे हुए हिस्सों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। यह अत्यंत जटिल और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया होती है। करीब 25 से 30 प्रयासों के बाद चिकित्सकों ने डक्ट के दोनों सिरों को सफलतापूर्वक जोड़ते हुए स्टेंट स्थापित कर दिया।
स्टेंट लगते ही मिलने लगा फायदा
स्टेंट लगाए जाने के बाद पैंक्रियाटिक जूस का प्रवाह फिर से सामान्य रूप से छोटी आंत में शुरू हो गया। इसके परिणामस्वरूप फेफड़ों और पेट में जमा द्रव धीरे-धीरे कम होने लगा। मरीज का बुखार, दस्त और अन्य समस्याएं समाप्त हो गईं तथा भोजन पाचन की प्रक्रिया भी सामान्य हो गई।
45 दिन की निगरानी के बाद पूरी तरह स्वस्थ
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी मरीज का नियमित फॉलोअप किया गया। दवाओं में आवश्यक बदलाव, एंटीबायोटिक उपचार और विशेष आहार संबंधी सलाह दी गई। लगभग 40 से 45 दिनों की निगरानी और उपचार के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो गया। चिकित्सकों के अनुसार समय पर सही निदान और एंडोस्कोपिक तकनीक से किए गए उपचार के कारण बड़ी सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ी। इससे मरीज को भविष्य में इंसुलिन पर निर्भरता और अन्य गंभीर जटिलताओं से भी बचाया जा सका।
चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी सफलता
विशेषज्ञों का मानना है कि डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम के ऐसे मामलों में अक्सर बड़ी सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में बिना ऑपरेशन के जटिल एंडोस्कोपिक प्रक्रिया द्वारा सफल उपचार चिकित्सा क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।




